Thursday, 9 March 2017

धन का निष्कासन

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1. भू राजस्व पद्धति2. कृषि का वाणिज्यिकरण3. भारतीय हस्तशिल्प उद्योगों का  विनाश  4. भारतीय भारतीय धन का निष्कासन5. भारत में रेलवे का विकास6. भारत में आधुनिक उद्योगों का विकास

7. भारत में अकाल[vvi]


धन का निष्कासन[drain of wealth]

इस टॉपिक को समझने के लिए सबसे पहले जानेंगे की

धन का निष्कासन का तात्पर्य क्या है ?

1.धन का निष्कासन की शुरुआत
a. कब b.कहां से c. कैसे d.क्यों ?
2.धन के निष्कासन का स्त्रोत कौन-कौन से थे?
3.धन के निष्कासन की प्रक्रिया को बताने वाले लोग
4.हिस्टोरिकल डिबेट
a. साम्राज्यवादी इतिहासकार b. राष्ट्रवादी इतिहासकार
5.भारत के अर्थव्यवस्था पर राजनीति पर समाज और संस्कृति पर इसका प्रभाव क्या पड़ा
6.इनसे जुड़े कुछ प्रश्न




धन का निष्कासन का तात्पर्य क्या है

धन का निष्कासन एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत एक देश से दूसरे देश की ओर निरंतर धन का प्रवाह होता है, लेकिन उस धन के बदले में उस देश को कुछ भी प्राप्त नहीं होता है, ना तो वस्तु नहीं सेवा
                                    भारत में धन की निष्कासन प्रक्रिया की शुरुआत ब्रिटिश द्वारा जून 1757 में बंगाल विजय के बाद शुरू होता है प्रारंभ में इस धन का निष्कासन का स्वरूप था- बंगाल से लूट, बंगाल के नवाबो द्वारा दिया गया पुरस्कार, दस्तक के दुरुपयोग से प्राप्त लाभ, तथा 1765 के इलाहाबाद की संधि के बाद दीवानी अधिकार से प्राप्त राजस्व इत्यादि|

धन के निष्कासन के स्रोत

1. व्यापारिक एकाधिकार से प्राप्त लाभ|
2. कंपनी के कर्मचारियों के वेतन एवं पेंशन|
3. कंपनी के निवेशकों को दिया जाने वाला लाभांश|
4. कंपनी के लंदन स्थित ऑफिस एवं उससे संबंधित कर्मचारियों के ऊपर होने वाला ब्याय
5. कंपनी के सैन्य एवं असैन्य कार्यों से संबंधित वस्तुओं का खरीद भारत के बाजार में न करके लंदन के बाजार में किया जाता था जिसे स्टोर परचेस किया कहा जाता है, ताकि वहां के व्यापारियों को लाभ पहुंचाया जा सके|
6. सार्वजनिक व्यय के लिए लंदन से लिए गए ऋण का ब्याज का भुगतान, जैसे:- नहर योजना, अकाल प्रशासन सेना रेलवे इत्यादि से संबंधित खर्च लेकिन वास्तविकता तो यह है कि इस सार्वजनिक ऋण का बहुत कम अंश जनता के कल्याण के लिए किया जाता था| करीब 40-40% अंश सेना एवं रेलवे पर पर खर्च किया जाता था,सेना से साम्राज्य सुरक्षित होगी और रेलवे से भारत का आर्थिक शोषण होगा, जबकि किसानों को चाहिए था नहर ,
7. विदेशी पूंजी निवेश पर दीया जाने वाला ब्याज तथा उस पूंजी निवेश से प्राप्त लाभांश दोनों का निष्कासन जैसे:- भारत में ब्रिटिश सरकार भारतीय रेलवे के विकास में  पूंजी निवेश करने वाली ब्रिटिश कंपनियों को उनके कुल पूंजी के 5% का ब्याज का गारंटी देती थी| जबकि यह लाभांश दर ब्रिटेन में केवल 2% था|
                                       उल्लेखनीय है कि भारत के राष्ट्रवादी नेताओं ने ब्रिटिश सरकार के आर्थिक नीतियों का समीक्षा करके भारत से शांतिपूर्ण ढंग से निरंतर होने वाले धन का प्रवाह को उदघाटित करते हुए धन के निष्कासन से संबंधित प्रक्रिया को एक वैचारिक आधार प्रदान किया और यही वैचारिक आधार ब्रिटिश सरकार के वास्तविक स्वरुप को प्रस्तुत करने में, समझने में केंद्रीय भूमिका निभाया| इन राष्ट्रवादी नेताओं ने विशेष तौर पर दादा भाई नौरोजी, आर सी दत्त [ रोमेश चंद्र दत्त,ics थे|] तथा महादेव गोविंद रानाडे का नाम उल्लेखनीय है|
1. दादा भाई नौरोजी ने अपना इतिहासिक रचना 'poverty and unbritish rule in India' और england deaf to India' ने सबसे पहले ब्रिटिश शोषणकारी आर्थिक नीतियों का पर्दाफाश किया, नौरोजी पहला राष्ट्रवादी नेता थे जिन्होंने धन के निष्कासन की प्रक्रिया को चिन्हित करते हुए, बताया कि किस तरह से ब्रिटिश सरकार राजस्व, उद्योग, व्यापार, आदि स्रोत के माध्यम से भारतीय धन का निष्कासन करती है नौरोजी के अनुसार इस साम्राज्यवादी सरकार आर्थिक नीतियों का सबसे घिनौना पक्ष यह है कि यहां की धन निष्कासित होकर ब्रिटेन जाते थे| और वही धन हमें रीढ़ के रूप में उपलब्ध किए जाते थे और उसके लिए हमें अधिक मात्रा में ब्याज देना पड़ता  था|
नौरोजी के अनुसार ब्रिटिश सरकार केवल भारतीय धन का ही निष्कासन नहीं करती है बल्कि नैतिकता का भी निष्कासन करती है क्योंकि यह भारतीय लोगों को उनके अधिकारों से ही वंचित रखती है|
नौरोज बुद्धिवादी इतिहास द्वारा प्रतिपादित धन के निष्कासन के सिद्धांत को आर सी दत्त ने एक नया आयाम को जोड़ते हुए प्रतिपादन किया है आर सी दत्त ने आधुनिक भारत के अर्थव्यवस्था पर पहला बुद्धिवादी इतिहास "दी इकनोमिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया" के रुप में प्रस्तुत किया| अपने इस प्रसिद्ध पुस्तक में उन्होंने धन के निष्कासन के सिद्धांत को एक नया तरीका से देखने का प्रयास किया, जिसके तहत उन्होंने ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीय धन के लूट के तीन चरणों में विभाजित करते हुए अध्ययन का प्रयास किया है जैसे:- 
वाणिज्यवादी चरण[ mercantalist stage]:-[1757-1813] इस चरण में ब्रिटिश सरकार का मुख्य उद्देश्य था भारतीय व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करना, अधिक से अधिक मुनाफा कमाना, भारतीय व्यापार के लिए ब्रिटेन से लाए जाने वाले धन को बंद करना और भारतीय धन से जो लूट दस्तक दुरुपयोग एवं व्यापारिक एकाधिकार से प्राप्त आय या धन से ही भारतीय वस्तुओं को खरीदने एवं निर्यात करना| 
आद्योगिक पूंजीवादी चल:-[industrial captist stage or free trade stage][1813-1857] ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति के बाद एक नवीन राजनीतिक एवं आर्थिक परिदृश्य सेना रियो उभरकर आया| इसी परिदृश्य एक सशक्त मध्यम वर्ग ब्रिटेन में उभरकर आने लगा जोकि औद्योगिक क्रांति से पैदा हुआ था परिणाम स्वरुप इस मध्य वर्ग के हित में ब्रिटेन और भारत के बीच के आर्थिक संबंधों का पुनर्निर्धारण करना अनिवार्य हो गया| और इसी परिपेक्ष्य में 1813 का अधिनियम पारित किया गया जिसके द्वारा भारतीय व्यापार पर ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापारिक एकाधिकार को खारिज कर दिया गया और भारतीय व्यापार एवं वाणिज्य को पूरे ब्रिटिश नागरिकों के लिए खोल दिया गया परिणाम स्वरुप ब्रिटिश सामग्रियों से भारतीय बाजार भर गया| 
इस अवधि में ब्रिटिश सरकार की आर्थिक नीति का मुख्य मांग था:- 
a. ब्रिटिश उद्योगों के लिए कच्चा माल 
b. ब्रिटिश उत्पादित सामग्रियों के लिए बाजार और इस तरह भारत ब्रिटेन का कच्चा माल का सप्लायर एवं बाजार के रूप में तब्दील हो गया| 
औपनिवेशिक पूंजीवाद चरण:- [colonical capitaism]1857 के बाद भारत और ब्रिटेन के बीच के आर्थिक संबंधों का पुनर्निर्धारण किया गया| इस अवधि में ब्रिटेन में औद्योगिकरण से जनित पूंजी का निवेश भारत में किया जाने लगा क्योंकि भारत ब्रिटिश पूंजीपतियों के के द्वारा अपने पूंजी निवेश के लिए एक उत्तम स्थान था और इस तरह ब्रिटिश सरकार जहाजरानी उद्योग ,बीमा एजेंसी, बैंकिंग आदि क्षेत्रों में पूंजी का निवेश करने लगी| और इस निवेश से प्राप्त होने वाला ब्याज एवं लाभांश दोनों की निष्कासन की प्रक्रिया शुरु आत होने लगी| 
            आर सी दत्त के अनुसार यह तीनों चरण अलग-अलग ना होकर एक ही प्रक्रिया के तीन चरण थे जिसके अंतर्गत पहला चरण समाप्त होने से पहले दूसरे चरण के लिए अनुकूल आधार दे देता था|

 महादेव गोविंद रानाडे तथा गोपाल कृष्ण गोखले जैसे राष्ट्रवादी विचारको ने भी धन के निष्कासन के इस प्रक्रिया के ऊपर प्रकाश डाला है| इन के अनुसार सरकार सिंचाई योजनाओं पर खर्च करने के स्थान पर एक ऐसे मद में व्यय करती है जो प्रत्यक्ष रुप से साम्राज्यवादी सरकार के हितों से जुड़ा हुआ है|

   historical debate

धन के निष्कासन के संदर्भ में साम्राज्यवादी एवं राष्ट्रवादी इतिहासकार अलग-अलग मत प्रस्तुत करते हैं|

a. साम्राज्यवादी इतिहासकार 

जॉन stracy स्ट्रेची जैसे साम्राज्यवादी इतिहासकार कहते हैं कि ब्रिटेन ने भारत का धन नहीं लूटा, इनका कहना है कि ब्रिटेन ने भारत में उत्तम प्रशासन सुरक्षा एवं बुनियादी सुविधाओं का विकास किया| और उसके बदले में पारिश्रमिक[ धन] प्राप्त किया, अर्थात एक हाथ से सेवा प्रदान किया और दूसरे हाथ से उसका मूल्य लिया, इसी क्रम में मोरिस डी मोरिस का कहना है कि भारत में ब्रिटिश सरकार की भूमिका एक सजग चौकीदार की तरह है जिसने भारत में विकास की संभावनाओं को एक छत्रछाया प्रदान किया

b. राष्ट्रवादी इतिहासकार 

इस विचारधारा के समानांतर राष्ट्रवादी विद्वानों ने धन के निष्कासन की प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए इस तथ्य का प्रतिपादन किया है कि भारत के विकास एवं औद्योगिक, सांस्कृतिक, पिछड़ेपन के लिए ब्रिटिश सरकार की शोषणकारी आर्थिक नीतियां ही प्रत्यक्ष तौर पर जिम्मेदार है| राष्ट्रवादी लेखकों का कहना है कि भारत के गरीबी एवं पिछड़ापन न तो कोई दैवीय प्रकोप है और ना ही इतिहासिक विरासत है इसके अनुसार जिस सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, एवं आर्थिक प्रक्रिया में ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति का जन्म दिया, वहां के सांस्कृतिक विकास का मार्ग प्रशस्त किया, उसी प्रक्रिया ने भारत को अल्प विकास दरिद्रता अकाल व्यापार वाणिज्य उद्योगों का विनाश आदि को जन्म दिया |
    इस संदर्भ में विद्वान सुलिवान का कथन साम्राज्यवादी मनोवृति का पर्दाफाश कर देता है' ब्रिटिश सरकार की व्यवस्था स्पंज है जो गंगा के पानी को सोखता है और टेम्स नदी मेंनिचोड़ देता है[ गंगा पानी का तात्पर्य है भारत का पूंजी और टेम्स नदी से तात्पर्य है ब्रिटेन]|


प्रभाव 

1. अर्थव्यवस्था 

धन का निष्कासन तो पूंजी का संचयन है, जब पूंजी का संचयन नहीं तो औद्योगिक विकास नहीं|
कुटीर उद्योगों का विनाश, कृषि पर दबाव और कृषि पर दबाव तो भूमिहीन किसानों की जनसंख्या बड़ी|
भारतीय लोगों कर का बोज बड़ा परिणाम स्वरुप उनका जीवन स्तर निरंतर दैनिय होते गया| सब मिलाकर या संक्षेप में धन के निष्कासन में भारतीय अर्थव्यवस्था को अपंग बना दिया|

2. राजनीतिक 

राष्ट्रवादी विचार को ने धन का निष्कासन के सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुए साम्राज्यवाद एवं राष्ट्रवाद के बीच अंतर विरोध को पहचान लिया और इस तरह आर्थिक राष्ट्रवाद की अवधारणा को जन्म दिया, जिसके माध्यम से ब्रिटिश सरकार के सारे दावों को जैसे
उपयोगितावाद आधुनिकरण के प्रतीक स्वराज्य के शिक्षक आदि को खारिज करने में मदद मिला और यही आर्थिक राष्ट्रवाद कि चेतना 1906 में स्वदेशी आंदोलन में उभरकर आने लगी जब विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं का प्रसार का नारा लगाया गया

3. समाज एवं संस्कृति पर प्रभाव 

धन के निष्कासन से सिल्क उद्योग व्यापार कृषि आदि में निवेश नहीं हुआ परिणाम स्वरूप लोगों के प्रति व्यक्ति आय घटने लगा अकाल की  निरंतरता ने इनके जीवन को और भयावह  बना दिया| परिणाम स्वरुप यूरोप के अन्य राज्यों के सापेक्ष ,भारत के अन्य राज्यों के सापेक्ष जीवनस्तर एवं जीवन प्रत्याशा दोनों घटा और यही शोषित लोग कलांतर में भारतीय राष्ट्रवाद के सामाजिक आधार बनकर उभरे|

इससे जुड़े कुछ प्रश्न 
धन के निष्कासन का अभिप्राय क्या है? उन स्रोतों को चिन्हित करें जिनके माध्यम से धन के निष्कासन की प्रक्रिया संचालित होती थी| 
धन के निष्कासन के सिद्धांत ने आर्थिक राष्ट्रवाद की अवधारणा को जन्म दे दिया..comment[200 words] 
ब्रिटिश सरकार के अधीन भारत में अल्प विकास का ही विकास हुआ?


for more click रेलवे का विकास


     

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